प्राकृतिक चिकित्सा

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में इन तीन बातों की अत्यधिक आवश्यकता होती है – स्वस्थ जीवन, सुखी जीवन तथा सम्मानित जीवन। सुख का आधार स्वास्थ्य है तथा सुखी जीवन ही सम्मान के योग्य है।

आयुर्वेद का अनुपम उपहार

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स्वास्थ्य का सच्चा मार्ग

स्वास्थ्य का मूल आधार संयम है।

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Achyutaya HariOm Panchamrit Ras :अच्युताय हरिओम पंचामृत रस : स्वास्थय व ऊर्जा प्रदायक, पाचक, व रोगनाशक अदभुत योग

Achyutaya HariOm Santkripa Surma : अच्युताय हरिओम संतकृपा सुरमा - आँखों को सुरक्षित, निरोगी, तेजस्वी बनाने की क्षमता रखने वाला अदभुत योग

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Wednesday, 20 February 2013

वास्तु में द्वार व अन्य वेध


वास्तु में द्वार व अन्य वेध


मुख्य द्वार से प्रकाश व वायु को रोकने वाली किसी भी प्रतिरोध को द्वारवेध कहा जाता है अर्थात् मुख्य द्वार के सामने बिजली, टेलिफोन का खम्भा, वृक्ष, पानी की टंकी, मंदिर, कुआँ आदि को द्वारवेध कहते हैं। भवन की ऊँचाई से दो गुनी या अधिक दूरी पर होने वाले प्रतिरोध द्वारवेध नहीं होते हैं। द्वारवेध निम्न भागों में वर्गीकृत किये जा सकते हैं-
कूपवेधः मुख्य द्वार के सामने आने वाली भूमिगत पानी की टंकी, बोर, कुआँ, शौचकूप आदि कूपवेध होते हैं और धन हानि का कारण बनते हैं।
स्तंभ वेधः मुख्य द्वार के सामने टेलिफोन, बिजली का खम्भा, डी.पी. आदि होने से रहवासियों के मध्य विचारों में भिन्नता व मतभेद रहता है, जो उनके विकास में बाधक बनता है।
स्वरवेधः द्वार के खुलने बंद होने में आने वाली चरमराती ध्वनि स्वरवेध कहलाती है जिसके कारण आकस्मिक अप्रिय घटनाओं को प्रोत्साहन मिलता है। चूल मजागरा (Hinges) में तेल डालने से यह ठीक हो जाता है।
ब्रह्मवेधः मुख्य द्वार के सामने कोई तेलघानी, चक्की, धार तेज करने की मशीन आदि लगी हो तो ब्रह्मवेध कहलाती है, इसके कारण जीवन अस्थिर व रहवासियों में मनमुटाव रहता है।
कीलवेधः मुख्य द्वार के सामने गाय, भैंस, कुत्ते आदि को बाँधने के लिए खूँटे को कीलवेध कहते हैं, यह रहवासियों के विकास में बाधक बनता है।
वास्तुवेधः द्वार के सामने बना गोदाम, स्टोर रूम, गैराज, आऊटहाऊस आदि वास्तुवेध कहलाता है जिसके कारण सम्पत्ति का नुकसान हो सकता है।
मुख्य द्वार भूखण्ड की लम्बाई या चौड़ाई के एकदम मध्य में नहीं होना चाहिए, वरन किसी भी मंगलकारी स्थिती की तरफ थोड़ा ज्यादा होना चाहिए।
मुख्य द्वार के समक्ष कीचड़, पत्थर ईंट आदि का ढेर रहवासियों के विकास में बाधक बनता है।
मुख्य द्वार के सामने लीकेज आदि से एकत्रित पानी रहने वाले बच्चों के लिए नुकसानदायक होता है।
मुख्य द्वार के सामने कोई अन्य निर्माण का कोना अथवा दूसरे दरवाजे का हिस्सा नहीं होना चाहिए।
मुख्य द्वार के ठीक सामने दूसरा उससे बड़ा मुख्य द्वार जिसमें पहला मुख्य द्वार पूरा अंदर आ जाता हो तो छोटे मुख्य द्वार वाले भवन की धनात्मक ऊर्जा बड़े मुख्य द्वार के भवन में समाहित हो जाती है और छोटे मुख्य द्वारवाला भवन वहाँ के निवासियों के लिए अमंगलकारी रहता है।
मुख्यद्वार के पूर्व, उत्तर या ईशान में कोई भट्टी आदि नहीं होना चाहिए और दक्षिण, पश्चिम, आग्नेय अथवा नैऋत्य में पानी की टंकी, खड्डा कुआँ आदि हानिकारक है। यह मार्गवेध कहलाती है और परिवार के मुखिया के समक्ष रूकावटें पैदा होने का कारक है।
भवन वेधः मकान से ऊँची चारदीवारी होना भवन वेध कहलाता है। जेलों के अतिरिक्त यह अक्सर नहीं होता है। यह आर्थिक विकास में बाधक है।
दो मकानों का संयुक्त प्रवेश द्वार नहीं होना चाहिए। वह एक मकान के लिए अमंगलकारी बन जाता है।
मुख्यद्वार के सामने कोई पुराना खंडहर आदि उस मकान में रहने वालों के दैनिक हानि और व्यापार-धंधे बंद होने का सूचक है।
छाया-वेधः किसी वृक्ष, मंदिर, ध्वजा, पहाड़ी आदि की छाया प्रातः 10 से सायं 3 बजे के मध्य मकान पर पड़ने को छाया वेध कहते हैं। यह निम्न 5 तरह की हो सकती है।
मंदिर छाया वेधः भवन पर पड़ रही मंदिर की छाया शांति की प्रतिरोधक व व्यापार व विकास पर प्रतिकूल प्रभाव रखती है। बच्चों के विवाह में देर व वंशवृद्धि पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
ध्वज छाया वेधः ध्वज, स्तूप, समाधि या खम्भे की छाया के कारण रहवासियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
वृक्ष छायावेधः भवन पर पड़ने वाली वृक्ष की छाया रहवासियों के विकास में बाधक बनती है।
पर्वत छायावेधः मकान के पूर्व में पड़ने वाली पर्वत की छाया रहवासियों के जीवन में प्रतिकूलता के साथ शोहरत में भी नुकसानदायक होती है।
भवन कूप छायावेधः मकान के कुएँ या बोरिंग पर पड़ रही भवन की छाया धन-हानि की द्योतक है।
द्वारवेध के ज्यादातर प्रतिरोध जिस द्वार में वेध आ रहा है उसमें श्री पर्णीसेवण की लकड़ी की एक कील जैसी बनाकर लगाने से ठीक होते पाये गये हैं।








आधुनिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में वास्तु


आधुनिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में वास्तु



हमारा सौर मंडल विद्युत-चुंबकीय तरंगों से भरा हुआ है। पृथ्वी इसी सौरमंडल का एक उपग्रह है। पृथ्वी भी एक बड़ा चुंबक ही है। अपनी धुरी पर घूमते हुए पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है। इस तरह पैदा होनेवाली विद्युत-चुम्बकीय तरंगों से पूरा वातावरण आच्छादित है। हमारे शरीर के विभिन्न कार्य भी विद्युत-चुम्बकीय तरंगों द्वारा ही हृदय, मस्तिष्क व इन्द्रियों द्वारा होते हैं। इस विद्युत शक्ति के माध्यम से ही जीवनशक्ति या चेतना शक्ति काम करती है।
अतएव विद्युत-चुम्बकीय क्षेत्र मानव जीवन के लिए आवश्यक तत्त्व है जिससे यह जीवन क्रियावान है। वास्तु विज्ञान जीवन तंत्र और पर्यावरण के बीच स्थापित सम्बन्ध को सही रास्ते पर चलाने में एक सेतु है जो उचित मार्गदर्शन कर रास्ता दिखाता है। डी.सी. (डायरेक्ट करंट के रूप में) विद्युत के आविष्कार के बाद से ही ए.सी. (Alternating Current) 110V, 220V, 440V, 11000V हजारों मेगावोल्ट, माइक्रोवेव, रेडियो तरंगे आदि की खोज हुई। यह तरंगे द्वारा एवं बिना तार के भी अदृश्य रूप से वातावरण में हमारे शरीर के चारों तरफ रहती हैं, प्रभाव डालती हैं, जिसे जानने व मापने के लिए वैज्ञानिक दिन-प्रतिदिन नयी-नयी खोजों में व्यस्त हैं। पशुओंपक्षियों पर भी इनके प्रभाव के अध्ययन हुए। मानव शरीर पर हुई खोजों से पता चला कि उच्चदाब विद्यित लाइन के पास रहने वालों में कैंसर रोग की बढ़ोतरी सामान्य से दुगनी होती है। उच्चदाब की विद्युत लाइन पर काम करने वालों में सामान्य से 13 गुना ज्यादा दिमागी कैन्सर की संभावना रहती है। टी.वी. से निकलने वाली विद्युत-चुम्बकीय तरंगें आँखों के  नुकसान पहुँचाती हैं व इन तरंगों का परिमाण 3 फीट के क्षेत्र में 3 मिलीगास से अधिक होता है। पलंग लगे साइड बिजली स्विचसाइड लैम्प से तरंगे हमारे शरीर तक पहुँचकर एक तरह का तनाव पैदा करती है जिसके कारण कई तरह की बिमारीयाँ पैदा होती हैं। मोबाइल, कार्डलेस फोन का ज्यादा उपयोग करने वालों का अनुभव है उनके कान व सिर में दर्द होने लगता है। वैज्ञानिक खोज से पता चला है कि मोबाइल फोन के पास लाने से मस्तिष्क में विद्युत-चुम्बकीय तरंगें लाखों गुना बढ़ जाती हैं। इसी तरह कम्पयूटर सबसे ज्यादा तरंगे पीछे की तरफ से प्रसारित करता है। इसलिए कम्पयूटर की पीठ हमारी तरफ नहीं होनी चाहिए। इसी तरह मोबाइल टावर्स के आसपास का क्षेत्र भी हानिकारक आवृत्ति की तरंगों से भरपूर रहता है वहाँ ज्यादा समय तक रहना स्वास्थ्य के लिए अति नुकसान दायक हैं।
विद्युत के स्विच बोर्ड व मरकरी टयूबलाइट आदि के आसपास छिपकलियाँ दिखाई देती हैं। छिपकली ऋणात्मक ऊर्जा का प्राणी है इसलिए ऋणात्मक ऊर्जा प्राप्त कर जीवनयापन करती है। मनुष्य, गाय, घोड़ा, बकरी, कुत्ता, भेड़ आदि धनात्मक ऊर्जा पुंज वाले प्राणी हैं अतः इनके सम्पर्क में रहना और ऋणात्मक ऊर्जा वाले तत्त्वों से दूर रहना मानव शरीर को स्वस्थ व सम्बल बनाये रखने के लिए जरूरी है। छिपकली, दीमक, साँप, बिल्ली, शेर आदि ऋणात्मक ऊर्जा पुंज का प्राणि है और ऋणात्मक ऊर्जा क्षेत्रों में निवास बनाते व रहना पसंद करते हैं।
वैज्ञानिकों को शोध से पता चला है कि वास्तु शास्त्र के सिद्धान्तों के पालन से वास्तु अनुकूल वातावरण व उनके रहवासियों में वांछित ऊर्जा स्तर होता है जो उनके स्वास्थ्य व विकास में सहायक होता है। वास्तु अनुकूल व प्रतिकूल वातावरण व वहाँ के निवासियों के आभामंडल चित्रण तथा एक्यप्रेशर बिन्दुओं के परीक्षण से यह निष्कर्ष प्राप्त हुए। खोज में पाया गया है कि एक ही तरह के वास्तु विरूद्ध निर्माण में रहने से वहाँ के निवासियों में एक ही तरह के एक्यूप्रेशर बिन्दु मिलते हैं। वास्तु अनुकूल वातावरण बनाने से वातावरण तथा वहाँ के निवासियों के आभामंडल में वांछित बदलाव आता है। इस पर आगे खोज जारी है तथा इन यंत्रों का वास्तु निरीक्षण में प्रयोग शुरू भी हो गया है।
इसी तरह विद्युत-चुम्बकीय व अन्य अलफा, बीटा, गामा रेडियो धर्मी तरंगों से बचाव व जानकारी हेतु परम्परागत वास्तु के साथ-साथ नये वैज्ञानिक यंत्र डॉ. गास मीटर, एक्मोपोल, जीवनपूर्ति ऊर्जा परीक्षक (Biofeed back energy Tester) लेचर एंटीना, रेड-अलर्ट, उच्च व नीची आवृत्ति (Low and high frequency) की तरंगों व रेडियो धर्मी तरंगों के मापक यंत्र आदि का उपयोग भी वास्तु सुधार में उल्लेखनीय पाया गया है जो परम्परागत वास्तु के आधुनिक प्रगति के दुष्परिणामों से बचाव के लिए हमें सावधान कर सकता है।
वास्तु सिद्धान्तों का प्रयोग अब नये क्षेत्रों जैसे इन्टरनेट में वेब डिजाइन, लेटरपेड, विजिटिंग कार्ड डिज़ाइन, 'खेती में वास्तु' में भी सफलतापूर्वक किया गया है। पुरातन काल में भी फर्नीचर, शयन, विमान (वाहन) में वास्तु के उपयोग का वर्णन शास्त्रों में है। नयी खोजों व प्रयोगों से वास्तु सुधार में गौमूत्र की उपयोगिता पर भी प्रयोग किये गये हैं व पुरातन ज्ञान की पुष्टि हुई है।
संक्षिप्त में हमें वातावरण में व्याप्त आधुनिक प्रगति के साथ उत्पन्न प्रदूषण से बचने के लिए निम्न सावधानियाँ लेनी चाहिए।
नयी जमीन खरीदते समय ध्यान रखें कि जमीन उच्च दाब की विद्युत लाइन से कम-से-कम 60 मीटर (200 फीट) दूर हो ताकि विद्युत तरंगों के मानव शरीर पर सतत दुष्प्रभाव से बचाव हो सके।
कम्प्यूटर के सामने से कम से कम ढाई फीट दूर व पीछे से 3 फीट दूर रहे तथा मानीटर से साढ़े तीन फीट दूर रहना ही श्रेयस्कर है।
शयन कक्ष में विद्युत उपकरणों को सोने से पहले बन्द कर उनके प्लग साकेट से बाहर निकाल देना चाहिए। शयन स्थल व कार्य स्थल से सात फीट के अन्दर किसी तरह का विद्युत स्विच व लैम्प आदि न लगायें।
मोबाइल फोन का उपयोग हैन्ड फ्री सेटइय़रफोन से ही करें तथा मोबाइल फोन हृदय के पास न रखें।
शेविंग मशीन, हेयर ड्रायर, माइक्रोवेव ओवन आदि शक्तिशाली तरंगे उत्पन्न करते हैं इनका उपयोग कम-से-कम होना चाहिए।
इलेक्ट्रानिक घड़ी आदि शरीर से 2.5 फीट दूर रखें। सर के पास रखकर न सोयें।
नई जमीन खरीदते समय विकिरण तरंगों (अल्फा, बीटा, गामा आदि) की जाँच करवा लें ताकि यदि यह सहनीय स्तर से अधिक हो तो बचाव हो सके। प्रारम्भिक प्रयोगों से पता चला है कि गौमूत्र से उत्पादित (फिनाइल आदि) के पौंछे से विकिरण की तरंगों से बचाव हो जाता है। इसी उद्देश्य से तहत संभवतः हमारे ऋषि-मुनियों ने गौमूत्र व गोबर से पोछा लगाने की प्रथा प्रचलित की थी जो अब धार्मिक कार्यों के अलावा लुप्त प्रायः हो गई है।
नये भवन के निर्माण में विद्युत संबंधित लाइनें व उपकरण इस तरह लगायें जायें जिससे मान शरीर पर उनका प्रभाव न पड़े अथवा कम से कम पड़े।





 


किचन संबंधित खास वास्तु टिप्स


किचन संबंधित खास वास्तु टिप्स




महिलाओं का अधिकतम समय किचन में ही बीतता है। वास्तुशास्त्रियों के मुताबिक यदि वास्तु सही न हो तो उसका विपरीत प्रभाव महिला पर, घर पर भी पड़ता है। किचन बनवाते समय इन बातों पर गौर करें।

किचन की ऊँचाई 10 से 11 फीट होनी चाहिए और गर्म हवा निकलने के लिए वेंटीलेटर होना चाहिए। यदि 4-5 फीट में किचन की ऊँचाई हो तो महिलाओं के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कभी भी किचन से लगा हुआ कोई जल स्त्रोत नहीं होना चाहिए। किचन के बाजू में बोर, कुआँ, बाथरूम बनवाना अवाइड करें, सिर्फ वाशिंग स्पेस दे सकते हैं।

किचन में सूर्य की रोशनी सबसे ज्यादा आए। इस बात का हमेशा ध्यान रखें। किचन की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि इससे सकारात्मक व पॉजिटिव एनर्जी आती है।

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किचन हमेशा दक्षिण-पूर्व कोना जिसे अग्निकोण (आग्नेय) कहते है, में ही बनवाना चाहिए। यदि इस कोण में किचन बनाना संभव न हो तो उत्तर-पश्चिम कोण जिसे वायव्य कोण भी कहते हैं पर बनवा सकते हैं।

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किचन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्लेटफार्म हमेशा पूर्व में होना चाहिए और ईशान कोण में सिंक व अग्नि कोण चूल्हा लगाना चाहिए।

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किचन के दक्षिण में कभी भी कोई दरवाजा या खिड़की नहीं होने चाहिए। खिड़की पूर्व की ओर में ही रखें।

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रंग का चयन करते समय भी विशेष ध्यान रखें। महिलाओं की कुंडली के आधार पर रंग का चयन करना चाहिए।

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किचन में कभी भी ग्रेनाइट का फ्लोर या प्लेटफार्म नहीं बनवाना चाहिए और न ही मीरर जैसी कोई चीज होनी चाहिए, क्योंकि इससे विपरित प्रभाव पड़ता है और घर में कलह की स्थिति बढ़ती है।

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किचन में लॉफ्ट, अलमारी दक्षिण या पश्चिम दीवार में ही होना चाहिए।

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पानी फिल्टर ईशान कोण में लगाएँ।








व्यापार में सफलता देते हैं यह वास्तु टिप्स


व्यापार में सफलता देते हैं यह वास्तु टिप्स


वास्तु शास्त्र के सिद्धांत सिर्फ घर पर ही नहीं बल्कि ऑफिस व दुकान पर भी लागू होते हैं। यदि दुकान या ऑफिस में वास्तु दोष हो तो व्यापार-व्यवसाय में सफलता नहीं मिलती। किस दिशा में बैठकर आप लेन-देन आदि कार्य करते हैं, इसका प्रभाव भी व्यापार में पड़ता है। यदि आप अपने व्यापार-व्यवसाय में सफलता पाना चाहते हैं नीचे लिखी वास्तु टिप्स का उपयोग करें-

वास्तु शास्त्रियों के अनुसार चुंबकीय उत्तर क्षेत्र कुबेर का स्थान माना जाता है जो कि धन वृद्धि के लिए शुभ है। यदि कोई व्यापारिक वार्ता, परामर्श, लेन-देन या कोई बड़ा सौदा करें तो मुख उत्तर की ओर रखें। इससे व्यापार में काफी लाभ होता है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है कि इस ओर चुंबकीय तरंगे विद्यमान रहती हैं जिससे मस्तिष्क की कोशिकाएं सक्रिय रहती हैं और शुद्ध वायु के कारण भी अधिक ऑक्सीजन मिलती है जो मस्तिष्क को सक्रिय करके स्मरण शक्ति बढ़ाती हैं। सक्रियता और स्मरण शक्ति व्यापारिक उन्नति और कार्यों को सफल करते हैं। व्यापारियों के लिए चाहिए कि वे जहां तक हो सके व्यापार आदि में उत्तर दिशा की ओर मुख रखें तथा कैश बॉक्स और महत्वपूर्ण कागज चैक-बुक आदि दाहिनी ओर रखें। इन उपायों से धन लाभ तो होता ही है साथ ही समाज में मान-प्रतिष्ठा भी बढ़ती है।






छोटे छोटे वास्तु टिप्स, जिनसे खत्म होगा मानसिक तनाव


छोटे छोटे वास्तु टिप्स, जिनसे खत्म होगा मानसिक तनाव



- रात में झूठे बर्तन न रखें।

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संध्या समय पर खाना न खाएं और नही स्नान करें।

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शाम के समय घर में सुगंधित एवं पवित्र धुआ करें।

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दिन में एक बार चांदी के गिलास का पानी पीएं। इससे क्रोध पर नियंत्रण होता है।

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शयन कक्ष में मदिरापान नहीं करें। अन्यथा रोगी होने तथा डरावने सपनों का भय होता है।

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कंटीले पौधे घर में नहीं लगाएं।

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किचन में अग्रि और पानी साथ न रखें।

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अपने घर में चटकीले रंग नहीं कराये।

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घर में जाले न लगने दें, इससे मानसिक तनाव कम होता है।

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किचन का पत्थर काला नहीं रखें।

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भोजन रसोईघर में बैठकर ही करें।

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इन छोटे-छोटे उपायों से आप शांति का अनुभव करेंगे।

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घर में कोई रोगी हो तो एक कटोरी में केसर घोलकर उसके कमरे में रखे दें। वह जल्दी स्वस्थ हो जाएगा।

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घर में ऐसी व्यवस्था करें कि वातावरण सुगंधित रहे। सुगंधित वातावरण से मन प्रसन्न रहता है।





वास्तु टिप्स: कौन सा समय किस काम के लिए होता है शुभ?


वास्तु टिप्स: कौन सा समय किस काम के लिए होता है शुभ?




सूर्य, वास्तु शास्त्र को प्रभावित करता है इसलिए जरूरी है कि सूर्य के अनुसार ही हम भवन निर्माण करें तथा अपनी दिनचर्या भी सूर्य के अनुसार ही निर्धारित करें।

1-
सूर्योदय से पहले रात्रि 3 से सुबह 6 बजे का समय ब्रह्म मुहूर्त होता है। इस समय सूर्य घर के उत्तर-पूर्वी भाग में होता है। यह समय चिंतन-मनन व अध्ययन के लिए बेहतर होता है।

2-
सुबह 6 से 9 बजे तक सूर्य घर के पूर्वी हिस्से में रहता है इसीलिए घर ऐसा बनाएं कि सूर्य की पर्याप्त रौशनी घर में आ सके।

3-
प्रात: 9 से दोपहर 12 बजे तक सूर्य घर के दक्षिण-पूर्व में होता है। यह समय  भोजन पकाने के लिए उत्तम है। रसोई घर व स्नानघर गीले होते हैं। ये ऐसी जगह होने चाहिए, जहां सूर्य की रोशनी मिले, तभी वे सुखे और स्वास्थ्यकर हो सकते हैं।

4-
दोपहर 12 से 3 बजे तक विश्रांति काल(आराम का समय) होता है। सूर्य अब दक्षिण में होता है, अत: शयन कक्ष इसी दिशा में बनाना चाहिए।

5-
दोपहर 3 से सायं 6 बजे तक अध्ययन और कार्य का समय होता है और सूर्य दक्षिण-पश्चिम भाग में होता है। अत: यह स्थान अध्ययन कक्ष या पुस्तकालय के लिए उत्तम है।

6-
सायं 6 से रात 9 तक का समय खाने, बैठने और पढऩे का होता है इसलिए घर का पश्चिमी कोना भोजन या बैठक कक्ष के लिए उत्तम होता है।

7-
सायं 9 से मध्य रात्रि के समय सूर्य घर के उत्तर-पश्चिम में होता है। यह स्थान शयन कक्ष के लिए भी उपयोगी है।

8-
मध्य रात्रि से तड़के 3 बजे तक सूर्य घर के उत्तरी भाग में होता है। यह समय अत्यंत गोपनीय होता है यह दिशा व समय कीमती वस्तुओं या जेवरात आदि को रखने के लिए उत्तम है।





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