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Monday, 19 August 2013
80 प्रकार के वात रोगों को जड से खत्म कर देगा यह प्रयोग
80 प्रकार के वात रोगों को जड से खत्म कर देगा
यह प्रयोग
सभी प्रकार के वातरोगों में लहसुन का उपयोग करना
चाहिए। इससे रोगी शीघ्र ही रोगमुक्त हो जाता है तथा उसके शरीर की वृद्धि होती है।'
कश्यप ऋषि के अनुसार लहसुन सेवन का उत्तम समय पौष व
माघ महीना (दिनांक 22 दिसम्बर से 18 फरवरी 2011 तक) है।
प्रयोग विधिः 200 ग्राम लहसुन छीलकर पीस लें। 4
लीटर दूध में ये लहसुन व 50 ग्राम गाय का घी मिलाकर दूध गाढ़ा होने तक उबालें। फिर
इसमें 400 ग्राम मिश्री, 400 ग्राम गाय का घी तथा सोंठ, काली मिर्च, पीपर, दालचीनी, इलायची, तमालपात्र, नागकेशर, पीपरामूल,
वायविडंग, अजवायन, लौंग,
च्यवक, चित्रक, हल्दी,
दारूहल्दी, पुष्करमूल, रास्ना,
देवदार, पुनर्नवा, गोखरू,
अश्वगंधा, शतावरी, विधारा,
नीम, सोआ व कौंचा के बीज का चूर्ण प्रत्येक
3-3 ग्राम मिलाकर धीमी आँच पर हिलाते रहें। मिश्रण में से घी छूटने लग जाय,
गाढ़ा मावा बन जाय तब ठंडा करके इसे काँच की बरनी में भरकर रखें।( और पढ़े - मेथी के फायदे)
10 से 20 ग्राम यह मिश्रण सुबह गाय के दूध के साथ लें
(पाचनशक्ति उत्तम हो तो शाम को पुनः ले सकते हैं।
भोजन में मूली, अधिक तेल व घी तथा खट्टे पदार्थों का
सेवन न करें। स्नान व पीने के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग करें।
विशेष :- अच्युतायसंधिशूलहर योग चूर्ण, अच्युताय रामबाण बूटी,और अच्युताय गोझरण अर्क
सभी प्रकार के वात रोगों में जादुई लाभ प्रदान करती है।
इससे 80 प्रकार के वात रोग जैसे – पक्षाघात (लकवा), अर्दित (मुँह का
लकवा), गृध्रसी (सायटिका), जोड़ों का
दर्द, हाथ पैरों में सुन्नता अथवा जकड़न, कम्पन, दर्द, गर्दन व कमर का
दर्द, स्पांडिलोसिस आदि तथा दमा, पुरानी
खाँसी, अस्थिच्युत (डिसलोकेशन), अस्थिभग्न
(फ्रेक्चर) एवं अन्य अस्थिरोग दूर होते हैं। इसका सेवन माघ माह के अंत तक कर सकते
हैं। व्याधि अधिक गम्भीर हो तो आश्रम से वैद्यकीय सलाह ले एक वर्ष तक भी ले सकते
हैं। लकवाग्रस्त लोगों तक भी इसकी खबर पहुँचायें। वात रोग को जड से मिटाने के लिए विस्तार से हरिओमकेयर
डॉट कॉम पर और भी ज्ञानवर्धक लेख देखें ।
Sunday, 18 August 2013
शक्तिदायक नारियल
August 18, 2013
1.Fruits and Other Food items for Health, 1.Helpful Tips(उपयोगी युक्तियाँ)
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शक्तिदायक नारियल
नारियल शीतल, स्निग्ध, बलदायी,
शरीर को मोटा करने वाला तथा वायु व पित्त को शांत करने वाला है।
सूखा नारियल वीर्यवर्धक है। इसमें कार्बोहाइड्रेटस,
प्रोटीन्स, वसा, कैल्शियम, पोटैशियम, सोडियम, लौह,
विटामिन 'सी' आदि प्रचुर
मात्रा में पाये जाते हैं।
इन गुणों के कारण नारियल आंतरिक गर्मी, अम्लपित्त
(एसिडिटी), आमाशय व्रण(अल्सर), क्षयरोग(टी.बी.),
दुर्बलता, कृशता व वीर्य की अल्पता में
लाभदायी है। यह पचने में भारी होता है इसलिए मात्र 10 से 20 ग्राम की मात्रा में
खूब चबा-चबाकर खायें। इसकी बर्फी या चटनी बनाकर अथवा सब्जी में मिलाकर भी खा सकते
हैं। नारियल बालक व गर्भवती माताओं के लिए विशेष पोषक तत्त्वों की पूर्ति कर देता
है।
पौष्टिक चबैनाः छुहारा, सूखा नारियल व मिश्री के छोटे-छोटे
टुकड़े कर मिलाकर रख लें। टॉफी-चाकलेट के स्थान पर बच्चों को यह पौष्टिक चबैना
दें। इससे दाँत, हड्डियाँ मजबूत बनेंगे व बुद्धि का भी विकास होगा।और भी स्वास्थ्य वर्धक पौष्टिक लेखों को आप विस्तार
से हरिओमकेयर डॉट कॉम पर देखें ।
सूचनाः अष्टमी के दिन नारियल खाने से बुद्धि का नाश होता है।
(ब्रह्म वैवर्त पुराण)
* नारियल तेल की मालिश से मस्तिष्क भी ठंडा रहता है।
* गर्मी में लगने वाले दस्तों में एक कप नारियल पानी में
पिसा जीरा मिलाकर पिलाने से दस्तों में तुरंत आराम मिलता है।
* बुखार के कारण बार-बार लगने वाली प्यास के इलाज के लिए
नारियल की जटा को जलाकर गर्म पानी में डालकर रख दें। जब यह पानी ठंडा हो जाए तो
छानकर इसे रोगी को पीने दें। इससे प्यास मिटती है।
* आँतों में कृमि की समस्या से निपटने के लिए हरा नारियल
पीसकर उसकी एक-एक चम्मच मात्रा का सुबह-शाम नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। कृमि की समस्या से निपटने के लिए अच्युतायकोष्ठ शुद्धि कल्प एक सुंदर उपाय है ।
* नारियल के पानी की दो-दो बूँद सुबह-शाम कुछ दिनों तक नाक
में टपकाने से आधा सीसी के दर्द में बहुत आराम मिलता है।
* नारियल की मलाई से आपको मैग्नीज की दैनिक आवश्यकता
की पूर्ति हो जाती है. यह खनिज रक्त के थक्के हटाने में सहायक कारकों के निर्माण
में मदद करता है. इसमें 15 प्रतिशत पोटैशियम होता है, जो मांसपेशियों,
हड्डियों और पाचनतंत्र को सही रखने में मदद करता है.
* नारियल का पानी त्वचा के लिए भी फायदेमंद होता है.
इसे नियमित रूप से त्वचा पर लगाने से दाग-धब्बे तो दूर होते हैं और त्वचा जवां नजर
आने लगती है. यह बहुत अच्छा क्लींजर होता है जिसका प्रयोग त्वचा के डेटोक्सीफाइंग
के रूप में किया जाता है.
* गर्मियों में नारियल पानी के सेवन से, आपको दिव्य आनंद
प्राप्त होगा। यह केवल आपको ताजगी ही नहीं, बल्कि इस में कई
सारे स्वास्थवर्धक गुण भी छुपे हैं। नारियल पानी में विटामिन, मिनरल, इलेक्ट्रोलाइट्स, एंजाइमस्,
एमिनो एसिड और साइटोकाइन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। आपको यह
जान कर हैरानी होगी कि नारियल पानी महिलाओं के स्वास्थ्य के लिये बहुत ही अच्छा
माना गया है। यदि पेशाब में जलन हो रही हो, डीहाड्रेशन हो
गया हो, त्वचा में निखार चाहिये हो या फिर मोटापा घटाना हो
तो नारियल पानी पीजिये। नारियल की तासीर ठंडी होती है इसलिए नारियल का पानी हल्का,
प्यास बुझाने वाला, अग्निप्रदीपक, वीर्यवर्धक तथा मूत्र संस्थान के लिए बहुत उपयोगी होता है। इसमें
स्वास्थवर्धक गुण तो है ही, साथ ही इसकी ताजगी से भरा स्वाद
इसे पूरे विश्व में लोकप्रिय बनाता है।
Friday, 16 August 2013
अँगूठा या उँगली पक जाये तो..?
अँगूठा या उँगली पक जाये तो..?
अँगूठा पकनाः अँगूठा पकने पर दर्द व जलन के
कारण बेचैनी होती है। निम्नलिखित प्रयोग से बिना चीरफाड़ के इससे छुटकारा मिलता
है।
प्रयोग विधिः अँगूठे पर आक के दूध की कुछ
बूँदें टपकाकर ऊपर से आक का पत्ता बाँध दें। तीन घंटे के अंतर से यह प्रक्रिया
दोहराते रहें। इससे अँगूठा पककर मवाद बाहर निकल आयेगा। जब तक मवाद निकलता रहे तब
तक यह प्रक्रिया दोहराते रहें। बाद में नीम के पत्ते डालकर उबाले हुए पानी से घाव
को धो लें, फिर नीम की पत्तियों को पीसकर बाँध
दें। घाव भरकर ठीक हो जायेगा।
मंत्र से आरोग्यता
मंत्र से आरोग्यता
शब्दों की ध्वनि का अलग-अलग अंगों पर एवं वातावरण पर असर होता है। कई
शब्दों का उच्चारण कुदरती रूप से होता है। आलस्य के समय कुदरती आ... आ... होता है।
रोग की पीड़ा के समय ॐ.... ॐ.... का उच्चारण कुदरती ऊँह.... ऊँह.... के रूप में
होता है। यदि कुछ अक्षरों का महत्त्व समझकर उच्चारण किया जाय तो बहुत सारे रोगों
से छुटकारा मिल सकता है।
'अ' उच्चारण से जननेन्द्रिय पर अच्छा असर पड़ता है।
'आ' उच्चारण से जीवनशक्ति आदि पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
दमा और खाँसी के रोग में आराम मिलता है, आलस्य दूर होता है।
'इ' उच्चारण से कफ, आँतों का विष और मल दूर होता है। कब्ज, पेड़ू के दर्द, सिरदर्द और हृदयरोग में भी बड़ा
लाभ होता है। उदासीनता और क्रोध मिटाने में भी यह अक्षर बड़ा फायदा करता है।
'ओ' उच्चारण से ऊर्जाशक्ति का विकास होता है।
'म' उच्चारण से मानसिक शक्तियाँ विकसित होती हैं। शायद इसीलिए
भारत के ऋषियों ने जन्मदात्री के लिए 'माता' शब्द पसंद किया होगा।
'ॐ' का उच्चारण करने से ऊर्जा प्राप्त होती है और मानसिक
शक्तियाँ विकसित होती हैं। मस्तिष्क, पेट और सूक्ष्म इन्द्रियों पर सात्त्विक असर होता है।
'ह्रीं' उच्चारण करने से पाचन-तंत्र, गले और हृदय पर अच्छा प्रभाव पड़ता
है।
'ह्रं' उच्चारण करने से पेट, जिगर, तिल्ली, आँतों और गर्भाशय पर अच्छा असर
पड़ता है।
Health by using mantra
The sound of various syllables have a strong impact on different parts of your body and the environment around us. Some syllables get spoken spontaneously like... at times of lethargy, one voices Aaaa... Aaa... When one is suffering from illness, the natural sound of AUM... AUM... modifies to Unh... Unhh.... If one can understand the significance of certain syllables properly, they can be used to cure numerous ailments.
"A" syllable influences the genital organs in a positive manner.
"Aaa" syllable boosts vital life energy. It provides relief from asthma, cough and also helps overcome laziness.
"Ei" syllable alleviates cough, impurities in bowel and clears stool. It provides great relief from constipation, stomach ache, headache and heart trouble. This syllable also mitigates sadness and anger.
"O" syllable invigorates the vital energy in us.
"Ma" syllable help develop higher mental capacity. Perhaps it is for this same reason that great saints of India preferred "Mata" as the choice of word for mother.
"AUM" syllable increases the vitality in us and develops higher mental acuity. It bears a positive, pious impact on our head, stomach and subtle organs.
"HREEM" syllable helps improve digestive power and strengthens neck and heart regions.
"HRAM" syllable renders positive influence on the stomach, liver, bowels and baby in the womb
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